तमसो मा ज्योतिर्गमय

तमसो मा ज्योतिर्गमय

शुभम् करोति कल्याणं, आरोग्यं धन संपदाम्।
शत्रु बुद्धि विनाशाय, दीपम् ज्योति नमोस्तुते।।

शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यम् धनसंपदा।

शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपकाय नमोऽस्तु ते।।

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दीपो ज्योति परं ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दन:।

दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तु ते।।

शुभं करोति कल्याणम् आरोग्यं धनसंपदा। शत्रु बुद्धि विनाशाय दीपज्योति नमोऽस्तु ते।।

शुभ =अच्छा।कल्याण =मंगल ,आनन्द। करोति =करता है। आरोग्यम् =रोग से मुक्ति।धनसंपदा =धनसम्पत्ति। शत्रु के बुद्धि के विनाश के लिए। दीप ज्योति =दीपक का प्रकाश। नमो अस्तु =नमस्कार है। ते = तुभ्यम्, तुम्हारे लिए।

अर्थ—मैं प्रकाश (दीपक) को प्रणाम करता हूँ जो शुभता लाता है, समृद्धि, अच्छा स्वास्थ्य लाने के साथ साथ अशुभ शक्तियों,प्रवृत्तियों (शत्रु बुद्धि)का भी विनाश करता है।

तमसो मा ज्योतिर्गमय

मुझे अंधकार से निकाल कर प्रकाश की ओर ले चलो पवमान मन्त्र या पवमान अभयारोह
बृहदारण्यक उपनिषद

ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतं गमय ॥ ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः ॥ – बृहदारण्यकोपनिषद् 1.3.28।

मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो।

मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो।

मुझे मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो॥

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते।

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

अर्थात: वह सच्चिदानंदघन परमात्मा सभी प्रकार से सदा परिपूर्ण है।
यह जगत भी उस परब्रह्म से पूर्ण ही है, क्योंकि यह पूर्ण उस पूर्ण पुरुषोत्तम से ही उत्पन्न हुआ है।

ॐ शान्ति शान्ति शान्तिः ॥

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